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Yes its sinking in.. Rank 40, CSE 2015.The UPSC circle- the close and the beginning.

Bagh-e-Bahisht Se Mujhe Hukam-e-Safar Diya Tha Kyun Kaar-e-Jahan Daraz Hai, Ab Mera Intezar Kar                      - Mohammad...

Tuesday, August 8, 2017

To a firefly.

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर।
मौसमों को बदलते हुए देखना,
भोर को सांझ में ढलते देखना,
और मुझे आसमां और ज़मी के दरमियां
सूखे पत्तों पे चलते हुए देखना।

हाँ सवेरे से  जब रात हो जायेगी,
इस ज़मीं की हर इक चीज़ सो जाएगी,
देर तक जागते मेरे दो नैन में;
एक आधा-सा बन ख्वाब जलना मगर।

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर।

रौशनी  ने कहा , भोर नज़दीक  है ;
मैंने  उससे  कहा और सब ठीक  है;
ढूंढ ला तू  फिर-से  आज वो जुगनू मेरा …
जो जानता है, मेरे साथ जगना  मगर।

जुगनुओं  को  बुझते -जलते देखना
वायदों  को पिघलते  हुए देखना।
और मुझे धुप छाओं  के  इस खेल  में ;
गिरते  उठते  संभलते  हुए देखना।

हाँ सवेरे से  जब रात हो जायेगी,
इस ज़मीं की हर इक चीज़ सो जाएगी,
देर तक जागते मेरे दो नैन में;
एक अधूरा सा बन ख्वाब जलना मगर।

रास्तों में कहीं रौशनी मिल गयी
मंज़िलों तक मेरे साथ चलना मगर। 

Thursday, August 3, 2017

Essays on travel - Breathing.

मौला इतना  बतला दे तू , क्यों बिसमिल -बिसमिल फिरता हूँ ?
है कौन मुसलसल सा मुझमें , जिसे रोज़ तलाश मै करता हूँ  ?
मुझको मुझसे यूँ रिहा कर दे ,
मै मिल जाऊँ जो फ़िर मुझमें। 
तू उतना ही मेरा भी है ,
मै जितना रहता हूँ तुझमें। 

ps: मुसलसल = continuous, linked in a series.
Picture clicket at Fatehpur sikri, Agra, India

Wednesday, August 2, 2017

Because you were built stone by stone.

No. Not your beauty and finesse which took me.
Nor your arches and hues, engravings and calligraphy.
They were magnificent, no doubt.
But I have reached,felt, absorbed 
- the stone you are built up of -
and how you have kept it
- integrated -

Because I know,
That's what makes you stand tall.
That's what will draw these birds to you each day.
Because l know,
You were built stone by stone.

Picture clicked at: Fatehpur sikri, Agra, India.

Thursday, July 20, 2017

What goes on in the heart of the city...


" कुछ बेलफ़्ज़ों- सी बातें हैं ,
कुछ लफ़्ज़ों-सी है ख़ामोशी 
कैसे मै कागज़ पर लिख दूँ 
है कौन यहाँ किसका दोषी?"


Tuesday, June 6, 2017

The star shrinks in its own gravity.

मै ये कहाँ आ गया
किसको कहूँ , न कहूँ ?
मैं हूँ अभी भी वहाँ
बैठा हुआ, हूबहू
मै हँसता हूँ ,
रो पड़ता हूँ
हूँ भूला ,
याद भी करता हूँ
- मै स्याही हूँ -
अपने रंगों से 
रोज़ मैं रोज़ झगड़ता हूँ
मै  बादल -सा घिर जाता हूँ
मै पागल - सा फिर आता हूँ
इन शहरों में
इन कसबों में
हर गाँव की
पगडंडी में
- जंगल जंगल -
किसको ढूंढूं ?
मैं रातों में , 
बीच अँधेरे और सवेरे के
आँखें खोलूँ ,आँखें मूंदूँ,,,
- ढूंढूं तेरी -
धड़कन की धुन
के बीच तेरी
- कंपन कंपन -
और फिर छुपकर
पलकों के तले
रिसती - रिसती
उलझन - उलझन।
पर बीच कहीं उसके मैंने
तेरी आँखों में
जो परियाँ  नाचती देखी थी,
उन परियों के
घरौंदों में
जलता है कहीं
एक काँच का पल
जग चूड़ी कंगन पहनेगा 
जलते उस काँच के रंगों का 
मैं कानों के इन बूंदों में 
पहनूँ रोज़ तुझे क्यों लम्हों सा ...
क्यों मै सोलह श्रृंगार करूँ ?
संगीत तेरा क्यों रोज़ सुनूँ ?
तोड़ूँ सब या तेरे ख़्वाब बुनूँ
हर रोज़ फिरूं
पागल पागल
बेचैन -बेचैन
बिस्मिल - बिस्मिल
बेकल - बेकल
किससे पूछूँ ?
तू मेरा कौन है?
मै तेरा कौन हूँ?
कौन अरमान है?
कौन अनजान है ?
दे बता अब ख़ुदा
अब तो ख़ुदा , दे बता ...

Saturday, June 3, 2017

The day I become a star.

One day there will be
no verses, 
conversations, 
sentences, 
words 
and alphabet.

Only points 
and lines.

To cross. 
Or to erase.

Wednesday, May 31, 2017

The explosion in your heart.

Things break the way they break.
As a crack in your favourite coffee mug.
Or as a bomb explosion.

So do people.
'I' 
am just one.
"कहीं आँखों से पढ़ लिए जाते थे,
यहाँ स्याही-स्याही करतें हैं। 
तू तो फिर भी इंसान है सुन, 
यहाँ लफ्ज़ भी टूटा करतें हैं।"

Monday, May 22, 2017

The twins...



This is me. This is you.
And the cities we built here.
This is me. This is you.
And the cities we build here.
"अनचले रास्तों का कोई मोड़ हूँ। 
मुझको छू दे जिधर से तू ,मै कोई और हूँ।"



Photograph- Clicked by a photographer friend

Saturday, May 20, 2017

Will the sky envelope the plateau?


A half written letter craves
- to hear -
that warmth in your chest
curling around the trembling silence
of its half- constructed sentences
tonight once again quivered,
once again stirred.

To its envelope, it once again cribs :
"Hide me from this cold cold world."

Please.


"इसके आगे कहो , अब कहाँ जाऊँ मैं ?
गिरती बारिश -सा हूँ, लौट न पाऊँ मैं। "


Picture credits: A photographer friend.